Monday, March 31, 2008

अप्रैल फूल बनाया बच्चे को दूध की जगह दारू पिलाया।

भाई लोग। इस लड़के का क्या कसूर। इसे नहीं मालूम कि आज अप्रैल फूल है। चाहे इसे दूध पिलाओ या दारू, लेकिन आपलोग इस कायॆ से बचिएगा।

Thursday, March 13, 2008

पिस्टल वाला भड़ासी बनना पड़ेगा

रात करीब १२ बजे सूचना मिली कि यशवंत भाई साब पर किसी ने हमला बोल दिया है। इसके बाद कुछ न समझ में आ रहा था कि क्या करें, क्या न करें। ऊपर से फोन भी नहीं लग रहा था। जी चाह रहा था कि अभी नोएडा पहुंच जाएं, पर घर पर फोन करने के बाद मालूम हुआ कि भाई साब को हल्की चोटें आई हैं और वे ठीक हैं। गाड़ी खुद चलाकर आए हैं। तब जाकर जान में जान आई। कुछ समय बाद ही उनका फोन भी आ गया। बोले कि भाई तुम क्यों घबड़ा रहे हो। मुझे कुछ नहीं हुआ है। इन कायर लोगों से हम डरते थोड़े ही नहीं है। अभी हमें बहुत जंग लड़ना है और सबमें जीत हासिल करनी है। जो हुआ सो हुआ। तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है। इसके बाद रातभर सोचता रहा। सोचा कि उठाउं पिस्टल और उन सालों को खोज-खोज कर भून डालूं।
सुबह जगा तो मालूम हुआ कि गांव के ही लड़के ने एक मास्टर साब को गोली मार दी है। बस उनका कसूर यही था कि उन्होंने उसे नकल करते पकड़ लिया था। सो मैं उन कायर लोगों से बस यही कहना चाहता हूं कि हमें भी पिस्टल उठाना आता है। खुलकर सामने आएं, तो बताएं कि हम भड़ासी किस मिट्टी के बने हुए हैं। पिस्टल चलाने में कोई हिचक नहीं होगी। बस एक आवाज निकलेगी........ठांय, ठांय और राम-नाम सत्य।
जय भड़ास
जय यशवंत
जय पिस्टल

Saturday, March 8, 2008

मीडिया या लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ?

मीडिया में ग्लोबलाइजेशन का असली चेहरा उजागर होता जा रहा है। विदेशी पूंची से संचालित मीडिया ने पुरानी अवधारणा को सिरे से नकार दिया है कि वह आज भी लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। विदेशी पूंजी के सहारे उसे चौतरफा लाभ दिखाई दे रहा है। अब मीडिया अपने पाठकों व दशॆकों को ही बुराई लगने लगी है। ग्लोबलाइजेशन की मदद से मीडिया ने पुराने आदशॆ को तिलांजलि देकर मुनाफा बाजार के नए मंत्र को स्वीकार कर लिया है। मीडिया के इस कदम के चलते उसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। अगर मीडिया मुनाफाखोरों से संचालित होगी, तो उसके फ्युचर की कल्पना की जा सकती है।
हालांकि यह भी है कि हिन्दी पत्रकारिता भी अपने आकार व सज्जा में सुंदर हो गई है। सरकुलनेशन भी उनका अंगेजी अखबारों से कहीं अधिक है। बाजार की मांग व पाठकों की पसंद को ही हिन्दी पत्रकारिता के लोग पूरा कर रहे हैं। इसके आधार पर वे क्रिकेट, काइम, कामेडी, सिनेमा व सेक्स को परोस रहे हैं।
जय भड़ास
जय हमशक्ल भड़ास

क्रेडिट लेना सीखो

यशवंत जी का मेल पढ़कर बहुत खुशी हुई। उन्होंने मेल में हमशक्ल भड़ासी के बजाय आलोक सिंह रघुवंशी करने का सलाह दिया। उनका कहना था कि अगर कुछ भी लिख-पढ़ रहे हो, तो उसका क्रेडिट लेना भी सीखो। बस मैंने अपने गुरु का कहना मान झटपट नाम चेंज कर दिया।

Thursday, March 6, 2008

दो बच्चों को जुड़वा तो तीन बच्चों को तिड़वा क्यों नहीं?

सामान्य रूप से महिलाएं एक समय में एक बच्चे को जन्म देती हैं। कभी-कभार दो या दो से अधिक बच्चों का जन्म होता है। दो बच्चों को हम जुड़वां बच्चे कहते हैं, तो एक साथ तीन बच्चें पैदा होंगे, तो हमें उसे तिड़वां बोलना चाहिए। ठीक जैसे अमेरिका में एक महिला ने तीन बच्चों को एक साथ जन्म दिया। तीनों की शक्ल एक जैसी मिलती है। डॉक्टरों का कहना है कि ऐसा अजूबा २० करोड़ बच्चों के जन्म के बाद ही होता है। ऐसे हम पत्रकार बंधु मिला-मिलाया आइटम ही पचा जाते हैं, जैसे कि ऊपर वाला न्यूज है। उसके अंदर जाकर जानने की कोशिश नहीं करते।
आइए हम जानते हैं कि जुड़वां या तिड़वां बच्चे कैसे पैदा होते हैं। मासिक धमॆ के दस दिन बाद से १८ दिन तक महिलाओं के प्रजनन अंगों से एक प्रकार का अंडा पैदा होता है। इसे ओवम कहते हैं। इस अवधि में जब महिला और पुरुष का संयोग होता है तो पुरुष के वीयॆ में उपस्थित स्पर्मो में से एक स्पमॆ इस अंडे में प्रवेश कर जाता है। अंडे में स्पमॆ के प्रवेश कर जाने की किया को ही गर्भाधान यानी महिला गभॆवती हो जाती है।
कभी-कभार ऐसा होता है कि गर्भाधान के बाद अंडा दो हिस्सों में बंट जाता है। गर्भाशय में दो बच्चों के रूप में विकास होता रहता है। परिणाम होता है कि ऐसी महिला के एक ही साथ दो बच्चे पैदा होते हैं। इस तरह पैदा हुए बच्चों का रंग-रूप और आकार एक जैसा होता है।
कभी-कभार दूसरी संभावना यह है कि मनुष्य के वीयॆ से दो स्पमॆ महिला के दो अलग-अलग अंडों में प्रवेश कर जाते हैं। इससे दो बच्चों का जन्म होता है, पर उनके रंग-रूप और आकार में अंतर होता है।
कुछ यूं ही रानी कौशल्या और कैकेई ने रानी सुमित्रा को दो फांक सेव दिया था और सुमित्रा ने भरत और शत्रुधन को जन्म दिया था।इस तरह के कई उदाहरण हैं, ब्राजील की एक महिला ने १० बच्चों को जन्म दिया था। स्पेन और चीन में भी १० बच्चों को पैदा करने का रिकाडॆ है। इस तरह के संसार में कई उदाहरण हैं।
अगर आप भाई बंधुओं को इसके बारे में अन्य जानकारी है, तो कृपया जानकारी दें।

Wednesday, March 5, 2008

ब्लॉग किस चिड़िया का नाम है

भड़ास-२ शुरू करने के बाद अधिकांश लोगों ने सराहा तो कुछ ने कहा कि कुछ नया करना था। उनकी बातें सुनकर मैं थोड़ा सा भी विचलित नहीं हुआ। दरअसल भड़ास से मुझे ब्लाग के बारे में जानकारी हुई कि ये चीज क्या है। कानपुर आईनेक्स्ट में था, तभी से ब्लाग और भड़ास के बारे में जानकारी हुई। पहली बार जब भड़ास देखा तो समझा कि पोटॆल होगा, वेबसाइट होगा। बाद में जब इसकी आदत सी हो गई तो मालूम हुआ कि ब्लाग किस चिड़िया का नाम है। भड़ास में पत्रकार बंधुओं के लिए शुरू किया गया कनबितयां काफी फेमस हुआ। कनबतिया के द्वारा ही राजीव जी के लुधियाना भास्कर ज्वाइन की खबर मिली। यहां तक कि उनके मोबाइल नंबर भी आसानी से मिल गए। सो मुझे लुधियाना आने में कोई दिक्कत नहीं हुई। घुमा-फिराकर यह कहना चाहता हूं कि भड़ास से कई लोगों को कुछ अलग करने की चेष्टा मिली है, चाहे वो मानें या न मानें।

प्रवीण ने तोड़ दी कमर

प्रवीण ने तोड़ दी कमरकामनवेल्थ बैंक सीरीज के बेस्ट आफ थ्री फाइनल में टीम इंिडया पहला और दूसरा फाइनल जीतकर सीरीज अपने नाम कर िलया। इसके बाद पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। जहां हम कुम्भकरण की तरह सोते थे, पर मैच देखने के िलए सुबह ही जग गया। अंततः टीम इंिडया के जुझारू प्रदर्शन की बदौलत आस्टेिलया को मुंह की खानी पड़ी। दूसरे फाइनल मैच में प्रवीण को मैन आफ द मैच तथा आस्टेिलया के नाथन ब्रेकन को मैन आफ द सीरीज अवाडॆ से नवाजा गया। प्रवीण ने िजस तरह से आस्टेिलया में िदग्गजों की मौजूदगी के बावजूद अपनी उप िस्थित दजॆ कराई है, वह कािबलेतारीफ है। फाइनल में प्रवीण के प्रदर्शन को सभी लोगों ने सराहा। प्रवीण के अलावा अगर िकसी िखलाड़ी ने प्रभावित िकया तो वे थे मास्टर-ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर, जिन्होंने दोनों फाइनल मैचों में शानदार बैटिंग की। पहले मैच में शतक तो दूसरे मैच में ९१ रन बनाकर उन्होंने अपने आलोचकों के मुंह पर ताला लगा दिया। फाइनल जीतने के बाद हरभजन सिंह और श्रीसंत के रिएक्शन देखने लायक थे। जहां हरभजन ने लगे रहो टीम इंडिया का नारा दिया वहीं श्रीसंत ने जय भारत माता दी, कहकर सबके िदल को छू िलया। वैसे हम बात कर रहे थे यूपी के होनहार खिलाड़ी प्रवीण कुमार की, जिन्होंने शुरुआत मेरठ ग्राउंड से की। जब मैं मेरठ में था, तब उसका नाम प्रकाश में आया, तब मुझे कतई अंदेशा नहीं था कि यही प्रवीण कुमार आज आस्टेिलया को चारों खाने िचत करने में हीरो बनेगा। कानपुर गया, तब भी रणजी मैचों के दौरान मेरी मुलाकात उससे हुई। एक बार होटल लैंडमाकॆ में हमारी मुलाकात हुई, तब मैं मो. कैफ का इंटरव्यू लेने गया था। प्रवीण कुमार के साथ ज्योति यादव व शिवाकांत भी थे। प्रवीण से बातचीत के दौरान मुझे अहसास हो गया िक एक िदन यह लड़का जरूर देश का नाम करेगा। बातचीत के दौरान ही उसने .बड़े भाई यशपाल जी का नाम िलया। बता दूं िक अगर प्रवीण कुमार को सबसे पहले किसी ने सराहा था, तो वे थे यशपालजी। अभी हाल ही में मेरठ में आयोिजत मीडिया टूनामेंट ( जो िक हर साल यशपाल जी आयोिजत करते हैं) में प्रवीण कुमार को होनहार खिलाड़ी का अवाडॆ भी िदया गया। हालांिक प्रवीण कुमार के आस्टेिलया में होने के चलते उनके बड़े भाई को अवाडॆ सौंपा गया।

भड़ास2: सस्ती लोकप्रियता का एक सस्ता माध्यम

इसे भड़ास की लोकप्रियता कहें या उसके प्रति मेरा सम्मान। अब चाहे यशवंत भाई साहब इसे बुरा क्यों न मानें, मैंने उनसे बिना पूछे भड़ास२ शुरू कर दिया है। मैं और अबरार ने मिलकर भड़ास२ के बनाने के बरे में सोचा और चट बिचार, पट भड़ास२ शुरू कर दिया। भड़ास२ में मैंने मुतो कम हिलाओ ज्यादा का ब्लॉग वर्णन डाला है। वहीं मेरे साथी लफ्ज़ ब्लॉग चलाने वाले अबरार अहमद का कहना है की भड़ास२ सस्ती लोकप्रियता का एक सस्ता माध्यम है। अभी तो मैं इसे सार्वजनिक नहीं करना चाहता हूँ। इसके बारे में केवल सचिन लुधियानवी को ही मालूम है , पर ब्लॉग के इस छोटी सी दुनिया में यह बात किसी से नहीं छिपेगी।

bhadai ho alok ji

swagat hai.