रात करीब १२ बजे सूचना मिली कि यशवंत भाई साब पर किसी ने हमला बोल दिया है। इसके बाद कुछ न समझ में आ रहा था कि क्या करें, क्या न करें। ऊपर से फोन भी नहीं लग रहा था। जी चाह रहा था कि अभी नोएडा पहुंच जाएं, पर घर पर फोन करने के बाद मालूम हुआ कि भाई साब को हल्की चोटें आई हैं और वे ठीक हैं। गाड़ी खुद चलाकर आए हैं। तब जाकर जान में जान आई। कुछ समय बाद ही उनका फोन भी आ गया। बोले कि भाई तुम क्यों घबड़ा रहे हो। मुझे कुछ नहीं हुआ है। इन कायर लोगों से हम डरते थोड़े ही नहीं है। अभी हमें बहुत जंग लड़ना है और सबमें जीत हासिल करनी है। जो हुआ सो हुआ। तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है। इसके बाद रातभर सोचता रहा। सोचा कि उठाउं पिस्टल और उन सालों को खोज-खोज कर भून डालूं।
सुबह जगा तो मालूम हुआ कि गांव के ही लड़के ने एक मास्टर साब को गोली मार दी है। बस उनका कसूर यही था कि उन्होंने उसे नकल करते पकड़ लिया था। सो मैं उन कायर लोगों से बस यही कहना चाहता हूं कि हमें भी पिस्टल उठाना आता है। खुलकर सामने आएं, तो बताएं कि हम भड़ासी किस मिट्टी के बने हुए हैं। पिस्टल चलाने में कोई हिचक नहीं होगी। बस एक आवाज निकलेगी........ठांय, ठांय और राम-नाम सत्य।
जय भड़ास
जय यशवंत
जय पिस्टल
Thursday, March 13, 2008
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